ए दामिनी


ए दामिनी
तेरे हौसले को सलाम करता हूँ
तेरे उम्‍मीद पर उम्‍मीद रखता हूँ
कभी तो ज़िंदा होगी
हमारी सोच;
इस सोच पर मैं शर्मिंदा होता हूँ!

ए दामिनी
तेरे जीने की चाह को सलाम करता हूँ
तेरे जीवन से ही कुछ बदलना चाहता हूँ
कभी तो मर्द बनेंगे
हम मर्द;
इस मर्दानगी पूर शोख मानता हूँ!

ए दामिनी
तू बिजली है!
तेरे ताक़त की मैं सराहना करता हूँ,
इस ज़माने से परे होके भी,
ज़माने की ताक़त
बनी है;
तेरे ताक़त से ही मैं यह ज़ोर रखता हूँ!

तू जी दामिनी,
तू जी!!
की शायद,
तेरे जीने का ही इंतेज़ार है;
तेरे जीवन से शायद मुक्त होगी
इस दौर की लाचारी;
इस क़ौम की कमज़ोरी;
हर मर्द की सीनाज़ोरी;
हर पीढ़ी की नैतिकता;
इस हैरत से कभी कभी मैं बे-उम्मीद होता हूँ!!

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